Wednesday, 7 October 2015

My first poem

बैठा था छत पर आनंद लेता हुआ वर्षा का,
बर्बश ही अतयंत उत्साह में कलम चल पड़ी|
विचारों का एक झन्झवात मस्तिस्क के चिलमन में आ गए,
और मुझे उनको लिपिबध करने को प्रेरित कर दिया|
एक विहग अपने तन मन कि शुधि करता हुआ दिख गया,
मानो कि वर्षो से उसने मजा ही ना लिया हो बारिश का|
मेरे सम्मुख व्रिछ इस प्रकार वायु का आलिंगन कर रहे है,
मानो कि इक नन्हा सा नहाता हुआ बालक अपने मा का|
मानो कि सदियों से संभोग ना कि हुयी इक मदमस्त स्त्री अपने सजन का,
मानो कि समुद्र कि लहरें अपने तट का इन मोतीयों से भीगे हुये वृक्ष इस प्रकार आकर्षित कर रहे हैं|
मानो कि वो फौरन ही स्नान करके आयी इक खूबसूरत स्त्री हो,
जिसे अनंत कल तक प्रेम करने को मन विचिलिट कर रहा है|
ईथलाती हुई, शरमाती हुई इन कि पत्तिया मन को भावविभोर कर दे रही है|
मानो अब मेरे अन्दर का बालक रो रहा है, चीख रहा है, बीना किसी बात को समझे ये जिद कर रहा|
कि छोड़ो अब और भी वयस्क बनना और जाके आलिंगन करो इन वर्षा कि बूँदों का, प्रेरित हो जाओ इन वृक्षओ से, इनकी पत्तियों से|
उस विहग से, उस गिल्रहरी से, सड़क के किनारे उस बालक से,
छोड़ दो इस कृत्रिम गंभीरता को और एक बार के लिये प्रकृति के इस स्नेह् को महसूस करलो|
अपने तन और मन को पटल लोक की गहराइयो तक भीगो कर पवित्र कर लो,
और बन जाओ ईश्वर का वो बन्दा, वो दूत जिसकी उसने परिकल्प्ना कि थी तुम्हारा सृजन करते समय||
सृजन करते समय || सृजन करते समय ||

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